July 14, 2012

हसरत-ए-अरमां




 
 चले थे बड़े गुमां के साथ
दिल में हसरत-ए-अरमां लिए
तलाश-ए-मजिल की
निकल पड़े अन्जां राह पर....
निकल आये बहुत दूर कि
दिखाई दी वीराने में
धुंध रोशनी सी
और धुधंली सी राह....


लेकिन जमाने की बेरूखी
और गन्दी सोच तो देखिये
बिछा दिये काटें राह में
जमाने का दस्तूर है ये तो
कसर ना छोड़ी राह ने भी
ठोकरे देने में हमें....
लेकिन चलते रहे फिर भी
हसरत-ए-अरमां लिए
कि जमाने को दिखा देंगे
कम नही तुझसे हम भी....
खुश हुए पलभर के लिए
कि हरा दिया जमाने को हमने
मंजिल-ए-करीब थे जब....
लेकिन देखिये तो सही
जिगर-ए-राजन
छोड़ आये मंजिल को
खुशी के लिए जमाने की
और हार गये जीत कर भी
हम जमाने से!!!

4 comments:

  1. इस कविता के भाव, लय और अर्थ काफ़ी पसंद आए। बिल्कुल नए अंदाज़ में आपने एक भावपूरित रचना लिखी है।

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  2. बहुत ही गहरे और सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने.....

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  3. Ji, Thanx, Ye Thodi Si Koshish Ki Thi.....

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  4. मन के भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

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