September 20, 2011

मम्मू जल्लाद को भी हताश करती थी देश की दुर्दशा

लेखक : अजय कुमार (लखनऊ)
मम्मू जल्लाद नहीं रहा। यह खबर सुन कर कुछ अजीब सा लगा। मैं जानता हूं कि उसके नाम के पीछे जल्लाद का ठप्पा भले ही लग गया था, लेकिन वह भी आम लोगों की तरह संवेदनशील था। उसकी सोच आम भारतीयों जैसी ही थी। बड़े-बड़े अपराधियों को फांसी के फंदे पर लटकाने वाले मम्मू को राजनेताओं द्वारा की जा रही देश की दुर्दशा का काफी मलाल था। राजनेताओं की लूट खसोट से वह भी उतना ही आहत रहता था,जितना एक आम आदमी को गुस्सा आता था। पिछले दिनों मम्मू ने को जब मेरठ में अपने घर पर आखिरी सांस ली तो जैसे जल्लाद परिवार के एक युग की ही समाप्ति हो गई। अब उसके परिवार मे इस पेशे को कोई नहीं अपनाएगा। मम्मू के दादा रामरखा ने अंगे्रजी हुकूमत में जल्लाद का काम शुरू किया था। रामरखा के काम में उसका जवान बेटा कल्लू ने भी सहयोग देने लगा था। कल्लू का बेटा मम्मू था। बाप के साथ उसने भी जल्लादी का पेशा अख्तियार कर लिया था। पिता कल्लू के सहयोग से बेटे मम्मू ने 1973 में पहली बार एक अपराधी को फांसी के फंदे पर लटकाया। कल्लू और मम्मू 1982 में तब सवार्धिक चर्चा में आए जब उन्होंने तिहाड़ जेल में रंगा-बिल्ला नाम के दो दर्रिदों को फांसी पर लटकाया था। उन दिनों मम्मू जवान था और पिता के काम में सहयोग करता था। अपने समय के चर्चित दो सगे नाबालिग भाई-बहन गीता-संजय चोपड़ा हत्याकांड के अपराधी रंगा-बिल्ला पर आधारित मेरे द्वारा लिखी अपराध कथा उस समय की सबसे अधिक बिकने वाली क्राइम पत्रिका ‘मनोहर कहानियां’ मे हुई थी। इसी कथा लेखन के दौरान कल्लू-मम्मू से मेरठ में मेरी मुलाकात हुई थी। तब मैंने उनका साक्षात्कार भी लिया था।

कोई छह माह पूर्व जब मैं मेरठ गया तो वहां के एक स्थानीय समाचार पत्र में मम्मू जल्लाद की बीमारी की खबर पढ़ी। मैं उससे मिलने से अपने आप को रोक नहीं पाया। मम्मू उस समय काफी बीमार था। घर के हालात दरिद्रता की कहानी बयां कर रहे थे। पूरा परिवार तंगहाल था। पहले तो मम्मू मुझे पहचान ही नहीं पाया। जब मैंने उसे बताया कि उसके और पिता कल्लू के बारे में तीस साल पहले मैंने ‘मनोहर कहानियां‘ में लिखा था तो उसे सब कुछ याद आ गया। कोई दस मिनट तक मेरी मम्मू से बातचीत हुई। तमाम पुरानी यादें ताजा हईं। उसके घर की दशा ठीक नहीं थी, लेकिन मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि वह अपने घर से अधिक अपने देश की दुर्दशा को लेकर चिंतित था। उसकी हसरत मुम्बई हमले के दोषी आतंकवादी कसाब और संसद हमले में मौत की सजा पाए अफजल गुरू को फांसी के फंदे पर झुलाने की है। उसे दुख इस बात का था कि खूनियों को तो फांसी दी जाती है लेकिन देश को लूटने वाले भ्रष्टाचारी नेताओं को आज तक फांसी पर नहीं लटकाया गया। जबकि वही सबसे बड़े गुनहगार हैं। मम्मू ने बातों ही बातों में बताया कि उसके दादा ने अंगे्रजी हुकूमत में पंजाब जाकर उस समय के क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह को फांसी पर लटकाया था। इसका गम आज भी उसके पूरे परिवार को सताता है। भगत सिंह को फांसी अंगे्रज सरकार के हुक्म पर हुई थी। लेकिन इस फांसी से उसका परिवार ही नहीं पूरा मेरठ तक कलंकित हुआ था। मम्मू ने कहा, ‘मेरी हसरत है कि आतंकवादी कसाब और अफजल गुरू को यदि मैं फांसी पर न लटकाने के लिए जिन्दा न रहा तो उन्हें मेरा बड़ा बेटा पवन फांसी पर लटकाए। जिससे भगत सिंह को दी गई फांसी के कलंक से मेरठ और मेरे परिवार का दाग धुल सके।‘

डेढ़ साल की लंबी बीमारी के बाद इसी 19 मई की शाम उसने अपने छोटे से घर पर ही अंतिम सांस ली। 65 वर्षीय मम्मू दमा से पीडि़त था। वक्त का तकाजा कहें या राजनीति की चाल अफजल और कसाब अभी भी अपनी मौत का इंतजार कर रहे हैं जबकि दूसरी ओर इन दोनों को फांसी पर लटकाने की अंतिम इच्छा लिये मम्मू जल्लाद दुनिया से चला गया। टीपी नगर की नई बस्ती स्थिति तंग गलियों में अपने भरे-पूरे परिवार के साथ मम्मू जल्लाद रहता था। उसके छह बेटे, तीन बेटियां और ढाई दर्जन नाती-पोते हैं। मम्मू जल्लाद के सबसे बड़े बेटे पवन उर्फ सिंधी के अनुसार पिछले मार्च में उत्तर प्रदेश सरकार ने उसके पिता का कांटेªक्ट खत्म कर दिया था।

मम्मू था तो जल्लाद लेकिन वह अपने काम के प्रति काफी गम्भीर रहता था। उसकी कोशिश यही रहती थी कि मरने वाले को फंासी के समय कम से कम तकलीफ उठानी पड़े। इसी लिए वह फंदे की रस्सी काफी मुलायम लेकिन मजबूत बनाता था। मम्मू का कहना था फांसी के फंदे की रस्सी वह विशेष प्रकार से तैयार करता था। रेशम और जूट के धागों को बट कर यह रस्सी बनाई जाती थी। किसी को फांसी देने के समय इस रस्सी में विशेष प्रकार का तेल और इत्र भी लगाया जाता था। मम्मू की मौत के बाद उत्तर भारत मेें अब केवल एक ही जल्लाद अहमद ही बचा है। अहमद लखनऊ में रहता है। मम्मू को इस बात का गम था कि इतना दर्दनांक काम करने वाले जल्लाद को एक फांसी देने की फीस मात्र सौ रूपए मिलती हैं। अगे्रजों के जमाने में यह रकम दस रूपए थी, जो अब बढ़ते-बढ़ते दस गुनी हुई है।

मम्मू ने दाताराम से लेकर कामता प्रसाद तक अपने जीवन काल में 15 लोगों को फांसी पर चढ़ाया था। वर्ष 1973 में उसने बुलंदशहर के रहने वाले दाताराम को सबसे पहले मेरठ जेल में फांसी दी थी। 1982 में उसने तिहाड़ जेल में बंद शातिर अपराधी रंगा और बिल्ला को फंासी पर लटकाया था। दिल्ली में रहने वाले कुलजीत सिंह उर्फ रंगा और जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला ने मासूम भाई-बहन संजय-गीता चोपड़ा का कार में लिफ्ट देने के बहाने अपहरण कर लिया था और दोनों बच्चों के मां-बाप से फिरौती तो मांगी ही इसके अलावा गीता को अपनी हवश का भी शिकार बना लिया था। बाद में इन दोनों ने संजय और गीता की हत्या कर दी थी। अपने जमाने का यह काफी हृदयविदारक और चर्चित मामला था। पूरे देश में इस काण्ड की महीनों चर्चा हुई थी।

उत्तर भारत के कई राज्यों सहित जबलपुर, दिल्ली और पंजाब मे कई अपराधियों कों फंासी पर लटका चुके मम्मू ने आखिरी बार सन 1997 में जयपुर में कामता प्रसाद तिवारी को फांसी दी थी। मम्मू ने अपने पिता कल्लू जल्लाद के साथ मिलकर 1989 मे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारों सतवंत सिंह और केहर सिंह को भी फांसी पर लटकाया था। मम्मू को विदेशों से भी फांसी देने के आफर मिले थे, लेकिन वह कभी विेदेश नहीं गया। मम्मू जल्लाद को लोगों को फांसी पर लटकाने के बदले प्रदेश सरकार की ओर से तीन हजार रूपये महीने की पगार मिलती थी, लेकिन पिछले छह महीनों से वह भी नहीं मिली। समाज विरोधियों को फांसी पर चढ़ाने जैसा पुण्य काम करने वाला मम्मू जल्लाद आखिरी सांस तक गरीबी से लड़ता रहा। मम्मू की मौत के बाद देश में अब केवल अहमद जल्लाद ही बचा है। मम्मू की मौत के साथ ही अब उसके बेटे पवन को जल्लादी का काम दिए जाने की मांग उठने लगी हैं। बदांयू जिला पंचायत के सदस्य अशोक कुमार ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को एक पत्र लिखकर आग्रह किया है कि मम्मू जल्लाद की अंतिम इच्छा का ध्यान रखते हुए कसाब और अफजल गुरू को फांसी उसके बेटे पवन के हाथों से ही दिलाई जाए। पवन कई बार पिता मम्मू के साथ फांसी देने के काम में सहयोग कर चुका है। लेकिन वह अब इस पेशे को नहीं अपनाना चाहता है। यह और बात है कि बाप की अंतिम इच्छा को पूरा करने के लिए वह कसाब और अफजल को फांसी पर लटकाने को तैयार है।

साभार लिंक : www.prabhasakshi.com

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