June 03, 2015

कवि, कलम और कलमकार






वैचारिक वेश्यावृत्ति, बनी देश का काल,

कलम वेश्या बन गई, छायाकार दलाल,

बुद्धू बक्सा बन गया, बहुत बड़ा होशियार,

उसे पूजने में लगे, कलमकार सरदार,

सत्ता के गलियारों में, है कोई मायाजाल,

कुछ अचरज मत मानिए, गर मिल जाएँ दलाल

कलमकार के रहनुमा, बन गए धन्नासेठ,

जनता बेबस देखती, बीच धार में बैठ.

क्यों कलमें वेश्या बन करके करती हैं गुमराह,

सत्ता के षड्यंत्रों की खोल न पाई थाह,

क्यों न कलम लिख सकी कभी की गाँधी को क्यों मारा था?

क्यों न कभी स्वीकार किया की चीन से भारत हारा था.

खोले भी तो बस वो पत्ते जिनसे चली दुकान,

राजनीति का चारण बन के, चलते सीना तान,

July 14, 2012

हसरत-ए-अरमां




 
 चले थे बड़े गुमां के साथ
दिल में हसरत-ए-अरमां लिए
तलाश-ए-मजिल की
निकल पड़े अन्जां राह पर....
निकल आये बहुत दूर कि
दिखाई दी वीराने में
धुंध रोशनी सी
और धुधंली सी राह....

May 12, 2012

1857 और आज

आज हम कितने स्वार्थी हो गये है। हमारे पास किसी के लिए वक्त नही है, यहाँ तक कि अपने बच्चों और अपने माता-पिता के लिए भी वक्त नही होता है। इससे साफ जाहिर होता है कि हमारे कदम पश्चिमी सभ्यता की ओर अग्रसर होते जा रहे है। पश्चिमी सभ्यता हमारे जीवन में अन्जाने में ही अपना वर्चस्व बढ़ा रही है। उदाहरण के तौर पर ही देख लिजिए 1857 के महासंग्राम को हमारे देश में सिर्फ एक दिन 10 मई को मनाया जाता है, वो भी इसलिए कि ताकि फार्मेलिटी पूरी की जा सके। लेकिन हम और हमारा समाज उस क्रान्ति के मनसूबों को अगर
ध्यान से समझे तो समझ आयेगा कि उस क्रान्ति का मतलब सिर्फ अंग्रेजो को भगाना ही नही था, बल्कि अपने देश के उद्योग-धन्धें, शिक्षा, खेती, परम्पराओं की रक्षा व अन्य भारतीय संपदाओं की सुरक्षा भी था।

March 16, 2012

कवि, कलम और कलमकार




वैचारिक वेश्यावृत्ति, बनी देश का काल,

कलम वेश्या बन गई, छायाकार दलाल,

बुद्धू बक्सा बन गया, बहुत बड़ा होशियार,

उसे पूजने में लगे, कलमकार सरदार,

LinkWithin